10.12.17

अर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार // Home remedies for arthritis


    अर्थराइटिस का दर्द इतना तेज होता है कि व्यक्ति को न केवल चलने–फिरने बल्कि घुटनों को मोड़ने में भी बहुत परेशानी होती है। घुटनों में दर्द होने के साथ–साथ दर्द के स्थान पर सूजन भी आ जाती है। इस दर्द से राहत दिलाने में आपका सबसे बड़ा हमदर्द होता है आहार और घरेलू नुस्खे। आइए जाने कैसे अर्थराइटिस में घरेलू नुस्खे सबसे सुरक्षित उपचार हैं।
कभी–कभी दर्द के कारण बुखार भी हो जाता है और यहां तक कि जोड़ों का आकार भी टेढ़ा हो जाता है। कुछ लोग तो अस्पतालों के चक्कर काटकाट कर इतने थक जाते हैं कि वो इस बीमारी के साथ जीने को स्वीकार कर लेते हैं।
ठंड के मौसम में गठिया के मरीज़ों को अधिक परेशानी होती है इसलिए उन्हें ठंड से बचने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। इस बीमारी में चिकित्सक आहार पर विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं क्योंकि आप जो भी खाते हैं वो सीधा आपके स्वास्‍थ्‍य को प्रभावित करता है।
• अपने आहार में 25 प्रतिशत फल व सब्जि़यों को शामिल करें और ध्यान रखें कि आपको कब्ज़ ना हो।
• फलों में सन्तरे, मौसमी, केले, सेब, नाश्पाती, नारियल, तरबूज़ और खरबूज़ आपके लिए अच्छे हो सकते हैं।
• सब्जि़यों में मूली, गाज़र, मेथी, खीरा, ककड़ी आपके आदि लें।
• चोकरयुक्त आटे का प्रयोग करें क्योंकि इसमें फाइबर अधिक मात्रा में होता है ।
दर्द से राहत पहुंचाने वाले घरेलू नुस्खे:
वात रोग (संधिवात)होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
• वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।


• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।
• 5 से 10 ग्राम मेथी के दानों का चूर्ण बनाकर सुबह पानी के साथ लें।
• 4 से 5 लहसुन की कलियों को एक पाव दूध में डालकर उबालकर पीयें।
• लहसुन के रस को कपूर में मिलाकर मालिश करने से भी दर्द से राहत मिलती है।
• लाल तेल से मालिश करना भी आरामदायक होता है।
• गर्म दूध में हल्दी मिलाकर दिन में दो से तीन बार पीयें।
• सोने से पहले दर्द से प्रभावित क्षेत्र पर गर्म सिरके से मालिश करें।
• कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है।
• शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
• जोड़ों के दर्द से बचने के लिए सबसे अच्छा। योगासन है गोमुखआसन।
अर्थराइटिस जैसी बीमारी लम्बे समय तक रहती है इसलिए मरीज़ को दवाओं से ज्यादा बचाव और सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए। आज फीजि़योथेरेपी से लेकर नैचुरोपैथी तक में अर्थराइटिस के बहुत से समाधान निकाले गये हैं, लेकिन घरेलू नुस्खे और सावधानियां सबसे सुरक्षित उपचार हैं।

7.12.17

बाहर निकली तोंद को अंदर करने के अनुपम नुस्खे



बाहर निकला हुआ पेट अंदर करने के 10 आसान घरेलू तरीके
मोटापा घटाने के लिए खान-पान में सुधार जरूरी है। कुछ प्राकृतिक चीजें ऐसी हैं, जिनके सेवन से वजन नियंत्रित रहता है। इसलिए यदि आप वजन कम करने के लिए बहुत मेहनत नहीं कर पाते हैं तो अपनाएं यहां बताए गए छोटे-छोटे उपाय। ये आपके बढ़ते वजन को कम कर देंगे।
1. पपीता नियमित रूप से खाएं। यह हर सीजन में मिल जाता है। लंबे समय तक पपीता के सेवन से कमर की अतिरिक्त चर्बी कम हो जाती है।
2. दही का सेवन करने से शरीर की फालतू चर्बी घट जाती है। छाछ का भी सेवन दिन में दो-तीन बार करें।
3. छोटी पीपल का बारीक चूर्ण पीसकर उसे कपड़े से छान लें। यह चूर्ण तीन ग्राम रोजाना सुबह के समय छाछ के साथ लेने से बाहर निकला हुआ पेट अंदर हो जाता है।
4. आंवले व हल्दी को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को छाछ के साथ लेंं। कमर एकदम पतली हो जाएगी।
5. ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली वस्तुओं से परहेज करें। शक्कर, आलू और चावल में अधिक कार्बोहाइड्रेट होता है। ये चर्बी बढ़ाते हैं।
6. केवल गेहूं के आटे की रोटी की बजाए गेहूं, सोयाबीन और चने के मिश्रित आटे की रोटी ज्यादा फायदेमंद है।
7. रोज पत्तागोभी का जूस पिएं। पत्तागोभी में चर्बी घटाने के गुण होते हैं। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म सही
रहता है।
8. मोटापा कम नहीं हो रहा हो तो खाने में कटी हुई हरी मिर्च या काली मिर्च को शामिल करके बढ़ते वजन पर काबू पाया जा सकता है। एक रिसर्च में पाया गया कि वजन कम करने का सबसे बेहतरीन तरीका मिर्च खाना है। मिर्च में पाए जाने वाले तत्व कैप्साइसिन से भूख कम होती है। इससे ऊर्जा की खपत भी बढ़ जाती है, जिससे वजन कंट्रोल में रहता है।
9. एक चम्मच पुदीना रस को 2 चम्मच शहद में मिलाकर लेते रहने से मोटापा कम होता है।
10. सब्जियों और फलों में कैलोरी कम होती है, इसलिए इनका सेवन अधिक मात्रा में करें। केला और चीकू न खाएं। इनसे मोटापा बढ़ता है। पुदीने की चाय बनाकर पीने से मोटापा कम होता है।

26.11.17

विटामिन ए के फायदे और स्रोत

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विटामिन वे आवश्यक कार्बनिक तत्व होते है जिनका निर्माण हमारा शरीर नहीं कर पाता. इनकी आवश्यकता हमारे शरीर को काफी अल्प मात्रा में होती है. शरीर में इनका उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहो हो सकता इसलिए इन्हें प्रतिदिन भोजन में लेना काफी जरुरी होता है. vitamins हमें काफी कम मात्रा में चाहिए होते है इसलिए इन्हें micro nutrients भी कहते है. हमारे शरीर को 13 प्रमुख विटामिन की जरुरत होती है जिसमे विटामिन ए, सी, डी, ई, के और विटामिन बी (थियामिन , राइबोफ्लेविन, नियासिन, पैंटोफेनीक एसिड, बायोटिन, विटामिन बी -6, विटामिन बी -12 और फोलेट) शामिल हैं। हर विटामिन का अपना एक कार्य होता है. अगर किसी भी विटामिन को कम मात्रा में लिया जाये तो इसके कारण कई तरह की समस्याएँ पैदा हो सकती है. उदाहरण के तौर पर vitamin A की कमी के कारण आखों से सम्बंधित समस्याएँ हो सकती है.
विटामिन ए वसा में घुलनशील विटामिन है। यह मुख्यतया रेटिनॉयड और कैरोटिनॉयड दो रूपों में पाया जाता है। सब्जियों का रंग जितना गहरा और चमकीला होगा, उनमें कैरोटिनॉयड की मात्र उतनी ही अधिक होगी। विटामिन शरीर के सभी अंगों को सुचारू रूप में चलाने में मदद करता है। हालांकि यह हमारे भोजन में विभिन्न रूपों में पर्याप्त रूप से रहता है, लेकिन अगर इसकी कमी भी हो तो इसकी पूर्ति के लिए प्राकृतिक स्रोतों का ही लाभ उठाना चाहिए।
विटामिन ए के उपयोग अच्‍छी सेहत के लिए यह सबसे महत्‍वपूर्ण विटामिन है। यह आंखों की रौशनी को तेज कर के उसकी मासपेशियों को मजबूत बनाता है। यह भ्रूण की नार्मल ग्रोथ और डेवलेप्‍मेंट के लिए बहुत अच्‍छा माना जाता है। त्‍वचा के लिए स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक होता है। रक्त में कैल्सियम का स्तर बनाए रखने और हडिडयों के संवर्द्ध के लिए आवश्यक है।हडिडयों, दांत, और ऊतकों के रख-रखाव के लिए आवश्यक है। ऊर्जा पैदा करने के लिए सभी कोशिकाओं को इसकी जरुरत पडती है।स्वस्थ रहने के लिए विटामिन ए के दोनों रूपों का सेवन करना चाहिए। कैरोटिनॉयड रूप विशेष परिस्थितियों में रेटिनॉयड रूप में परिवर्तित हो जाता है।

किसे चाहिए अधिक विटामिन ए-
शाकाहारी लोगों और शराब का सेवन करने वालों को इसकी अधिक जरूरत होती है। लिवर की बीमारियों, सिस्टिक फाइब्रोसिस आदि से पीड़ित लोगों को भी विटामिन ए की आवश्यकता होती है। कई लोग समझते हैं कि विटामिन ए केवल एक विशेष पदार्थ होता है, जबकि इसमें पोषक तत्वों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है। हर पोषक पदार्थ के अपने लाभ होते हैं। अधिक मात्र में विटामिन ए का सेवन ‘विटामिन के’ के अवशोषण को प्रभावित करता है। वसा में घुलनशीन विटामिन के रक्त का थक्का बनाने के लिए जरूरी है। विटामिन ए स्रोत-
चुकंदर, साग, ब्रोकली, साबुत अनाज, पनीर, गिरीदार फल, बटर, गाजर, मिर्च, डेयरी प्रोडक्‍ट, हरी पत्‍तेदार सब्‍जियां, अंडा, बींस, राजमा, मीट, आम, सरसों, पपीता, धनिया, चीकू, मटर, कद्दू, लाल मिर्च, सी फूड, शलजम, टमाटर, शकरकंद, तरबूत, मकई के दाने, पीले या नारंगी रंग के फल, कॉड लीवर ऑयल आदि।
अत्याधिक विटामिन ए लेने से शरीर पर अनेक दुर्प्रभाव हो सकते हैं जैसे कि सिरदर्द, देखने में दिक्कत, थकावट, दस्त, बाल गिरना, स्किन खराब हो जाना, हड्डी और जोडों में दर्द आदि की समस्या हो सकती है।

26.10.17

वीर्य गाढ़ा करने का अनुपम नुस्खा

  

वीर्य ही शारीर का सार है, एक योगी को सबसे ज्यादा दुःख अपने वीर्यपात होने पर ही होता है, मगर आज कल के युवा और आधुनिक डॉक्टर इसकी उतना नहीं आंकते, अत्यधिक मै आधा चम्मच इस चूर्ण को एक चम्मच पिसी हुई मिश्री के साथ मिलाकर खा जाएं। फिर ऊपर से हल्का गर्म दूध पी लें। करीब-करीब एक महीने तक इस मिश्रण का उपयोग करें।
      इस दौरान संभोग बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। यह सेक्स क्षमता को बढ़ाने वाला सबसे अच्छा उपाय है।   मैथुन से या अश्लील सिनेमा और साहित्य से वीर्यपात कर चुके युवा जिनका वीर्य पानी की तरह हो चूका है, उनका जीवन नरक के समान है. वीर्य ही जीवन है, यही व्यक्ति का ओज़ है|,वीर्य को गाढ़ा और शक्तिशाली करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का ये प्रयोग बहुत लाभदायक है.|
वीर्य गाढ़ा करने के लिए सफ़ेद प्याज और अजवायन का प्रयोग.
एक किलो सफ़ेद प्याज का रस निकाल कर रख लीजिये, इसमें 100 ग्राम अजवायन को 12 घंटे तक सफेद प्याज के रस में भिगोएँ जिससे अजवाईन इसको सोख ले, सुबह जब सारा रस अजवायन सोख ले तो इसको छाया में सुखा लें।
सूखने के बाद उसे फिर से इसी तरह  प्याज के रस में गीला करके सुखा लें। इस तरह से तीन बार करें। उसके बाद इसे कूटकर किसी बोतल में भरकर रख लें।

15.10.17

मिर्च खाएं, गठिया से निजात पाएं


वैज्ञानिकों की मानें तो तीखी मिर्च गठिया के दर्द से निजात दिला सकती है.
लंदन के किंग्स कॉलेज के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि मिर्च के तीखेपन से गठिया के दर्द का इलाज संभव हो सकेगा.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी यह शोध प्रारंभिक अवस्था में है लेकिन इससे गठिया की दवा तैयार हो सकेगी.
गठिया का रोग बड़ा कष्टप्रद माना जाता है और इसमें शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली जोड़ों पर हमला करती है जिसकी वजह से उनमें दर्द, सूजन और कड़ापन आ जाता है.
एक अनुमान के अनुसार विश्वभर में लाखों लोग गठिया से पीड़ित हैं.  

केवल ब्रिटेन में ही छह लाख लोग इससे पीड़ित बताए जाते हैं.
प्रोफेसर सूसन ब्रेन के नेतृत्व में दो साल पहले एक शोध दल का गठन किया गया था.
यह दल इस बात की जाँच कर रहा है कि मिर्च का तीखा तत्व किस तरह गठिया की परेशानी से छुटकारा दिला सकता है.
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इससे एक नई दर्दनाशक दवा तैयार हो सकेगी. साथ ही इसके दुष्प्रभाव भी नहीं होंगे.
प्रोफेसर सूसन ब्रेन का कहना है कि सदियों से मिर्च में पाया जाना वाला कैपसेसिन कई तरह की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है.
दर्द में आराम दिलानेवाली ऐसी क्रीमें उपलब्ध हैं जिनमें कैपसेसिन होता है. लेकिन अब तक खानेवाली दवा के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ है.
उनका कहना है कि कई दवा कंपनियों ने उनके इस शोध में दिलचस्पी दिखाई है.

14.10.17

उच्च रक्तचाप को जड़ से खत्म करने के आयुर्वेदिक उपाय



    हाइपरटेन्षन (hypertension) या उच्च रक्तचाप आज के समय के घातक रोगों में से एक है. इसे आयुर्वेद में ‘रक्त गति वात’ भी कहा जाता है. रक्तचाप की दर व्यक्ति की आयु, शारीरिक एवं मानसिक कार्यशीलता, परिवारिक पृष्ठभूमि तथा उसके खानपान पर निर्भर करती है. एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तचाप की दर 80 मि.मी. डाइयासटोलिक (diastolic) और 120 मि.मी. सिसटोलिक (systolic) होती है.
उच्च रक्तचाप के कारण-
अनुचित खानपान, अत्यंत गरिष्ठ भोजन का सेवन तथा शारीरिक व्यायाम की कमी उच्च रक्तचाप के प्रमुख कारण हैं. फास्ट फूड, फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक, प्रिज़र्वेटिव्स, इन सब कारणों से शरीर में जीवविष (toxins) प्रविष्ट होते हैं जो कि पाचन क्रिया पर प्रादुर्भाव डालते है. पाचन क्रिया के मंद पड़ने से भोजन से आम (acidic toxin) उत्पन्न होता है जो रक्त में प्लास्मा से संयुक्त होकर साम (Blood+Toxin) का निर्माण कर देता है. ‘साम’ सामान्य रक्त से अधिक घनिष्ट और भारी होता है जिस कारण ये रक्तवाहिनियों के कमज़ोर हिस्सों में जाकर जम जाता है. इस कारण रक्त धमनियों की चौड़ाई कम हो जाती है और रक्त को स्रोतों (channels- arteries) में वहन करने में अवरोध आता है और इस कारण धमनियों में अधिक दबाव या ‘ब्लड प्रेशर’ का निर्माण हो जाता है. मॉडर्न मेडिकल साइंस अब इस बात को स्वीकार रहा की रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का कारण है चीनी और वेजिटेबल आयिल्स के उपयोग से उत्पन्न धमनियों में जलन और शुष्कता. यह जड़ है इस बीमारी की.
मानसिक तनाव, चिंताग्रस्त रहने से, अधिक सोचने से भी रक्तचाप की दर सामन्य से बढ़ जाती है. बहुत अधिक तला हुआ गरिष्ठ भोजन खाना, चाय-कॉफी का अधिक सेवन, प्रोसेस्ड फूड भी रक्तचाप को बढ़ाने के कारण हैं.
उच्च रक्तचाप के लक्षण -
उच्च रक्तचाप को Silent Killer भी कहा जाता है. इस रोग के लक्षणों की सही पहचान करना अत्यंत आवश्यक है और इसका उपचार आयुर्वेद द्वारा संभव है. गर्दन के पीछे के हिस्से में दर्द (occipital headache), घबराहट और कंपकपी महसूस होना, चक्कर आना और बिना काम किए थकान का रहना, उच्च रक्तचाप के प्रमुख लक्षण है.
आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीनों दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ में उत्पन्न विकार से होता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. इसलिए उपचार में इन सब लक्षणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
उपचार विधि -
आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीन दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ सबको प्रभावित करता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. पित्त की विकृति भी इस रोग का प्रमुख कारण है. पित्त और वात प्रकृति के व्यक्ति जिनमें इन दोषों के विकृत होने की संभावना बनती है, उन लोगों में उच्च रक्तचाप होने की संभावना दूसरों से अधिक होती है. इस रोग के समूल नाश के लिए चिकित्सक सर्वप्रथम पाचन क्रिया को सुगठित करने की औषधि देते हैं. साथ ही साथ पूर्व में बढ़े हुए जीव विष (toxins) को शरीर से निकालना भी आवश्यक हैंं. मानसिक तनाव को घटाने के लिए, ध्यान, प्राणायाम को करना भी चिकित्सा का अंग है|
जीवनशैली और खानपान संबंधित सुझाव-
माँस, अंडे, नमक, अचार, चाय, कॉफी का प्रयोग निम्न मात्रा में करना चाहिए.
धूम्रपान और शराब का सेवन नही करना चाहिए.
प्रोटीन और वसा युक्त भोजन का सेवन कम-से-कम रखना और सब्जी, फल आदि की मात्रा भोजन में बढ़ाना हितकर है.
लहसुन, अमला, नींबू, चकोतरा, मौसमी, तरबूज़, बिना मलाई का दूध, और कॉटेज चीज़ का प्रयोग करने से रोगी को लाभ मिलता है. भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए.
vishकिसी एक विशिष्ट पद्धति द्वारा किए जाने वाला व्यायाम, जैसे कि जॉगिंग (jogging), तैरना या फुर्ती से की गयी नियमित सैर (brisk walking) को भी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए.
अगर संभव हो तो किसी समझदार योग सलाहकार द्वारा सीख कर अधोमुखश्वानसन, उत्तानसन, पश्चिमोत्तासन, हलासन, सेतु-बँध सर्वंगासन, इन सबका अभ्यास करने से विशेष लाभ होता है.
लाभदायक घरेलू औषधियाँ -
3 से 4 लहसुन लौंग, 10-12 तुलसी के पत्ते लेकर इनका रस निकाल लें और एक-चौथाई गिलास गेहूँ के जवारे के रस के साथ मिलकर रोज़ सेवन करें.
1 छोटे चम्मच प्याज़ के रस में बराबर मात्रा में शहद मिलकर एक हफ्ते तक सेवन करें. यदि लाभ मिले तो इस प्रयोग को कुछ और दिन तक जारी रखें.
लस्सी में एक छोटा चम्मच लहसुन का पेस्ट बनाकर दिन में दो बार लें.
10 ग्राम तरबूज के बीजों को भूनकर उन्हें पीस लें. इस पाउडर को 2 कप पानी में 10 से 15 मिनिट तक उबालें. प्राप्त मिक्स्चर को छान कर सेवन करें. यह प्रयोग रोज़ करें.
त्रिफला का रोज़ रात्रि में सेवन और एक चम्मच मेथी दाना रात को भिगो कर रखने के बाद प्रातः काल उसका सेवन करना चाहिए.
उच्च रक्तचाप में लाभकारी औषधियाँ -
सर्पगन्ध  एक ऐसी बूटी है जिसे सदियों से उच्च रक्तचाप के उपचार में प्रयोग किया गया है. रसगंधा नामक औषधि जिसमें शूतशेखर, जटामांसी और सर्पगन्ध प्रयोग होते हैं, इस व्याधि के निराकरण में अत्यंत उपयोगी है.
अर्जुन - शोध द्वारा ये नतीजे पाये गयें हैं कि यह अँग्रेज़ी चिकित्सा में प्रयोग होने वाली Beta-blocker दवाइयाँ की तरह ही अपना कार्य करती है. इसके साथ-साथ यह औषधि, जिगर तथा हृदय की रक्षाकारक भी है.
गोक्शूरा -: यह औषधि भी रोगनिवारक है तथा इसकी कार्यपद्धति ACE Inhibitors के समान है
पंचकर्म चिकित्सा द्वारा उच्च रक्तचाप का उपचार -
निरूह बस्ती चिकित्सा यदि किसी समझदार वैद्य द्वारा करवाई जाए तो इस रोग के उपचार में बहुत लाभ देती है. इसी प्रकार धारा चिकित्सा भी ज़िद्दी रोग के उपचार में लाभदायक है. दुग्ध तथा बाला द्वारा सिद्ध किए हुए तैल को रोगी के मस्तक पर डाल जाता है. इस विधि को चिकित्सक की देखरेख में किया जाना चाहिए और ये चमत्कारिक प्रभाव देती है.
दोष प्रधानता के अनुरूप रोग निवारण -
*यदि वात दोष के प्रादुर्भाव का कारण मुख्य रूप से रोग का कारण है तो चिंता, तनाव , अधिक सोचने, पढ़ने, लिखने से रोग में अभिवृद्धि पाई जाती है.
*इस अवस्था में रोग-निवारण हेतु रोगी के मनोरोग का उपचार प्रमुख रूप से किया जाता है.
वात उपचार: 125 मिलीग्राम सरपगंध और जटामंसी को 2.5 माह तक दिन में तीन बार लेना चाहिए.
*लहसुन का एक लौंग शहद के साथ रोज़ लेने से भी इसमें फायदा मिलता है.
*सारस्वत पाउडर भी इस रोग के उपचार में लाभदायक है.
*अश्वगंधा से बनी हुई औषधि मिश्रण का सेवन करना चाहिए.
*पित्त की विकृति द्वार उत्पन्न रोग में रोगी को अधिक क्रोध आता है, चिड़चिड़ापन, नकसीर फूटना, भयंकर सरदर्द, आँखों का चौधियाना,  आदि लक्षण मिलते हैं|
*पित्त को शांत करने वाले औषधियों का सेवन करने से इस अवस्था में राहत मिलती है. 250 मिलीग्राम ब्राहमी का सेवन रोज़ रात्रि मेी करना चाहिए.
*इसके अलावा ब्राहमी रसायन या सारस्वत पाउडर का प्रयोग भी लाभप्रद है.
*सर्वा (Indian sarsaparilla) का 15 दिन तक सेवन भी पित्त को शांत करता है.
*कफ की प्रधानता से उत्पन्न होने वाले रोग में व्यक्ति को हल्का सरदर्द, आलस्य, प्रमाद, हाथ-पाँव का फूलना उच्च रक्तचाप के साथ पाए जाते हैं.
chitr*इस अवस्था में रोग के निराकरण के लिए 1 ग्राम गुग्गुलु अथवा अर्जुन का दिन में दो बार सेवन करना चाहिए.
250 ग्राम शिलाजीत दिन में तीन माह के लिए दिन में तीन बार लाभप्रद है.
*रक्त धमनियों को साफ़ करने के लिए 1 ग्राम त्रिफला गुग्गूल का 3 महीने के लिए उपयोग फ़ायदेमंद है.
इस अवस्था में यदि 100 मिलीग्राम इलायची और दालचीनी का प्रयोग दिन में 3 बार 3 महीने तक किया तो लाभदायक सिद्ध होता है.
मंत्र शक्ति मे विश्वास रखने वाले व्यक्ति  निम्न मंत्र के प्रयोग  से लाभान्वित हो सकते हैं-
प्रसन्‍न मंत्र का प्रयोग ब्‍लड प्रेशर को दूर करने के लिए किया जाता है. इस मंत्र को उत्तर की ओर मुख करके 7 दिन तक जाप करने से लाभ मिलता है.
मंत्र यह  है: -
प्रसन्‍नवदनं ध्‍यायेत् सर्वविघ्‍नोपशान्‍तये

13.10.17

पित्त दोष वृद्धि के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार



जब शरीर में अग्नि तत्व की अधिकता हो जाए ; तो इसे पित्त दोष कहते है।
कारण व लक्षण :
– पित्त यानी गर्मी बढ़ने से जिस तरह दूध कुनकुना रहने से उसमे जीवाणु तेज़ गति से बढ़ते है और दही तुरंत जम जाता है ; वैसे ही शरीर में भी कीटाणु तेज़ी से पनपते है। इससे किसी भी तरह का इन्फेक्शन होने की पूरी संभावना होती है। अगर पित्त संतुलित हो तो शरीर किसी भी इन्फेक्शन से लड़कर ख़त्म कर देता है।
– गर्मी ज़्यादा होती है , पसीना अधिक आयेगा , चेहरा लाल या पीला दिख सकता है . दांत पीले रहेंगे और जल्दी सड़ने की संभावना रहेगी।
– पित्त बढ़ा हुआ हो तो नाड़ी देखते समय बीच वाली ऊँगली में स्पंदन अधिक महसूस होता है।यह ऐसा लगता है मानो मेंढक उछल रहा हो।
– गर्मी अधिक होने से सभी धातु पिघल कर बहेंगे। इससे बहता हुआ ज़ुकाम , अत्याधिक कफ वाली खांसी होने की संभावना होगी। श्वेत प्रदर , रक्त प्रदर आदि होने की संभावना रहेगी।
– गर्मी अधिक होने से मुंह में दुर्गन्ध आ सकती है , पसीने में भी दुर्गन्ध आ सकती है। पित्त संतुलित हो तो कितना भी पसीना आये उसमे कोई गंध नहीं होगी।
– गर्मी अधिक होने से ज़रूरी अंग जैसे किडनी खराब हो सकती है , हार्ट एन्लार्ज हो सकता है, बाल सफ़ेद हो सकते है।

– पिम्पल्स , फोड़े फुंसी आदि होने की संभावना बढ़ जाती है।
– सर दर्द , माइग्रेन आदि हो सकता है।
– पेट जल्दी जल्दी खराब होता है।
– क्रोध ,चिडचिडापन अधिक रहेगा।
– गुस्से से ,काम भावना से , ईर्ष्या की भावना से पित्त बढ़ता है।
– खान पान जैसे तिल , दाना , सुखा मेवा , मिर्च-मसाले , तैलीय पदार्थ , गाजर , ऊष्ण के खाद्य पदार्थों आदि के सेवन से पित्त बढ़ता है।
आयुर्वेदिक घरेलु उपचारों के बारे में लिखते हैं जो पित्त दोष से हमें राहत प्रदान करते है |
विभिन्न औषधियों से उपचार-
1॰ आकाशबेल (अमरबेल) : आकाशबेल का रस आधा से 1 चम्मच सुबह-शाम खाने से कब्ज और यकृत (लीवर) के सारे दोष दूर होते हैं साथ ही पित्त की वृद्धि को भी रोकता है और जलन भी दूर करता है।
2. गुरड़ी साग : गुरड़ी को साग के रूप में खाने से पित्त का विरेचन यानी दस्त के द्वारा बाहर निकल जाती है और पित्त के बढ़ने से होने वाले दोष मिट जाते हैं।
3. लज्जालु (छुईमुई) : लज्जालु (छुईमुई) का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने  से पित्त के बढ़ने से होने वाले सभी रोग दूर होते हैं।
 
4. छोटी दुद्धी : पित्त की वृद्धि होने पर उसे निकालने के लिए छोटी दूद्धी का रस 10 से 20 बूंद सुबह-शाम दूध में मिलाकर खाने से पित्त दस्त के साथ बाहर निकल जाता है।
5. सनाय की पत्ती : पित्त के बढ़ने से जलन का कष्ट ज्यादा होता है ऐसे में सनाय की पत्ती का चूर्ण 0.60 से 1.80 ग्राम को लौंग और मुलेठी के साथ पित्त के विरेचन के लिए सेवन करते रहें। जिससे पित्त निकल जाती है।
6. हरीतकी : हरीतकी का चूर्ण सुबह-शाम चीनी के साथ खाने से पित्त की वृद्धि खत्म होती है और जलन भी शान्त होती है।
7. कुटकी : शरीर में पित्त के साथ जलन, बुखार हो तो कुटकी का चूर्ण 0.60 ग्राम से 1.20 ग्राम और पुराना पित्त बुखार हो तो 3 से 4 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सुबह शाम चाटने से पित्त के बढ़ने की बीमारी में फायदा होगा।
8. पटुआ : पित्त की वृद्धि में पटुआ के फूलों का रस 10 मिलीलीटर में कालीमिर्च और मिश्री मिलाकर रोज पीने से शौच साफ आता है और पित्त(Pitt) की वृद्धि भी समाप्त हो जाती है। इसके पत्ते भी विरेचन (दस्त लाने वाले) गुणों से भरे होते हैं।
9. छोटी इलायची : छोटी इलायची 0.60 ग्राम सुबह-शाम देने से पित्त में फायदा होता है।
10 . छरीला : अगर पित्त ज्यादा बढ़ जाता है तो छरीला की फांट, जीरा और मिश्री बराबर मिलाकर 20 मिलीलीटर सुबह-शाम लेने से लाभ हो जाता है।
11. सेंवार : सेंवार के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से पित्त की वृद्धि शान्त होती है और जलन भी दूर होती है।
12. गुड़हल : पित्त के बढ़ने पर और इससे पैदा होने वाले किसी भी तरह के उपद्रव, सिर दर्द, उल्टी, मिचली या जलन आदि में गुड़हुल की 10 से 12 कलियां या फूलों को घोंटकर पिलाने से लाभ होता है।
13. सफेद गुड़हल : सफेद गुड़हल के पत्तों के रस में शक्कर डालकर पीने से बढ़ी हुई पित्त में लाभ मिलता है।
14. बरना : पित्त के ज्यादा होने पर फूलों को पीसकर, घोंटकर रोज सुबह-शाम पीने से या काढ़ा बनाकर 50 से 100 मिलीलीटर पीने से पित्त दस्त के साथ बाहर निकल जाती है।
15. सागोन (सागवान) : सागोन के पेड़ की छाल का चूर्ण 3 से 12 ग्राम सुबह-शाम खाने से पित्त खत्म होती है
16. गिलोय : गिलोय का रस 7 से 10 मिलीलीटर रोज 3 बार शहद में मिलाकर खाने से लाभ होता है।17. अमरा : पित्त के बढ़ने पर अमरा के फल का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से पित्त(Pitt) खत्म होती है।
18 . केला : पित्त के बढ़ने पर या पित्त से सम्बंधित बीमारी में केले के पेड़ का रस 20 से 40 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।
19. झड़बेर : झड़बेर के फल का शर्बत शीतल और पित्तनाशक होता है।
20. फालसे : फालसे के फल का शर्बत सुबह-शाम सेवन करने से पित्त का शमन होता है और पित्त (Pitt)से भरे जलन से मुक्ति मिल जाती है।
21. मुनक्का : पित्त के बढ़ने पर मुनक्का खाना फायदेमन्द होता है। इससे पित्त से भरी जलन भी दूर होती है
7. सफेद पाढ़ल (घंटा पाढर) : सफेद पाढ़ल के फूलों का रस 10 मिलीलीटर से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम लेने से पाचन क्रिया ठीक हो जाती है और खराब पित्त शरीर से बाहर निकल जाती है।
22. दमन पापड़ा : अगर पित्त बढ़ जाता है, उल्टी, जलन, भ्रम, चक्कर, प्यास, बुखार कुछ भी हो तो दमन पापड़ा या पित्त पापड़ा का काढ़ा 50 ग्राम सुबह-शाम लेने से फायदा होता है
23. वेदमुश्क की छाल : वेदमुश्क की छाल का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करने से शरीर की जलन और पित्त भी शान्त होती है।
24. हरी दूब : पित्त के बढ़ने पर हरी दूब का रस 10 मिलीलीटर सुबह-शाम मिश्री के साथ देने से फायदा होता है। पित्त के बढ़ने पर हरी दूब के अलावा अगर सफेद दूब का उपयोग किया जाये तो ज्यादा फायदा होता है।
25. कागजी नींबू : कागजी नींबू का शर्बत सुबह-शाम पीने से पित्त की वृद्धि बन्द हो जाती है।
26. कोकम : कोकम के पके फल का शर्बत सुबह-शाम पीने से पित्त शान्त हो जाती है।27. चना : 100 ग्राम चने के बेसन से बने मोतिया लड्डुओं के साथ दस पिसी कालीमिर्च मिलाकर खाने से पित्त की गर्मी में लाभ मिलता है।
28. दरियाई नारियल : पित्त के बढ़ने पर दरियाई नारियल के बीच का हिस्सा 0.48 मिलीग्राम से लेकर 1 ग्राम तक को गुलाबजल में घिसकर सुबह-शाम खाने से पित्त शान्त होती है और लाभ होता है।
29. गुलबनफ्शा : गुलबनफ्शा के फूलों की फांट या घोल 40 से 80 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से पित्त शान्त होती है।
30. सालव मिश्री का फल : पित्त को शान्त करने के लिए सालव मिश्री के फल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।
31. कागजी नींबू : पित्तशमन के लिए नींबू के रस और नमक का सेवन करना चाहिए।
32. इमली :
* जलन और पित्त के रोग को मिटाने के लिए इमली के कोमल पत्तों और फूलों की सब्जी बनाकर खानी चाहिए।
* मिश्री के साथ इमली का शर्बत ब-नाकर पीने से हृदय की दाह (सीने की जलन) दूर होती है।
* 10 ग्राम इमली और 25 ग्राम छुहारों को 1 लीटर दूध में उबालें। फिर इसे छानकर पीने से ज्वर की दाह (बुखार की जलन) और घबराहट शान्त होती है।
* वमन (उल्टी) और गर्मी का बुखार होने पर इमली का शर्बत बनाकर पीना चाहिए।
कैथ  पित्त शमन के लिए कैथ के गूदे को शक्कर के साथ खाना चाहिए।
पवांड़ : 2 से 4 ग्राम पवांड़ की जड़ के बारीक चूर्ण को घी में मिलाकर खाने से शीत-पित्त का रोग मिट जाता है।
34. लीची : लीची खाने से पित्त की अधिकता कम होती है।
35. पलास : पलास के गोंद को पानी में गलाकर प्रतिदिन लेप करने से पित्तशोथ मिट जाती है।
36. तुलसी : चौथाई चम्मच तुलसी के बीज एक आंवले के मुरब्बे पर डालकर प्रतिदिन दो बार खाएं। इससे पित्ती ठीक हो जाती है।
 
37. सांवा : पित्त के बढ़ने पर सांवा के पांचों भागों को मिलाकर बने काढ़े को 40 से 80 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से पित्त शान्त होती है।
38. तीनि (तीनि एक तरह की घास है, जो पानी में पायी जाती है) : पित्त के बढ़ने पर तीनि के चावल को उबालकर खाना चाहिए।
39. सफेद मरसा : सफेद मरसा के बीजों को भूनकर खाने से पित्त की वृद्धि कम हो जाती है। यह पित्त को शान्त करने में फायदेमन्द है। सफेद मरसा के पत्तों का साग भी खाने से फायदा होता है।
40 . चूका साग : चूका साग को, साग के रूप में खाने से पित्त के बढ़ने में लाभ होता है और जलन में भी शान्ति मिलती है।
41. आलूबुखारे : आलूबुखारे का रस 40 से 80 मिलीलीटर तक या काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर तक सुबह-शाम पिलाने से पित्त शान्त होती है।
42 . आलूचा : यह भी आलूबुखारे का ही भेद है। इसे भी पित्त शान्त करने के लिए रस या काढ़े के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
43. ऊदसलीब : अगर पित्त बराबर मात्रा में नहीं निकल रहा हो तो ऊदसलीब की जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम सुबह-शाम खाने से लाभ होता है।
44. कासनी ग्राम्य : कासनी ग्राम्य का फल खाने से पित्त की जलन और परेशानी दूर होती है।
45. कुंगकु की छाल : पित्त को कम व नियंत्रित रखने के लिये कुंगकु की छाल को पानी में उबालकर 40 से 80 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से पित्त बाहर निकल जाती है।
46. गिरिपर्पट की रेजिन : गिरिपर्पट की रेजिन 0.12 ग्राम से 0.24 ग्राम खाने से पित्त बाहर निकल जाती है। इसकी क्रिया धीरे-धीरे होती है मगर यह तेज होती है।